google-site-verification=GIaeBD26iM1El1_Rs0O2-yeM0Lzle6sVyMjx02rEXhc " स्वस्थ रहने के सूत्र "

नमस्ते! मैं [R.k.yऔर "स्वस्थ रहने के सूत्र" के माध्यम से मैं हेल्थ टिप्स, घरेलू नुस्खे, योग और संतुलित जीवनशैली से जुड़ी सरल और उपयोगी जानकारी साझा करता/करती हूँ। मेरा उद्देश्य है — हर किसी को स्वस्थ और खुशहाल जीवन जीने की प्रेरणा देना।

Friday, May 2, 2025

🌳भोजन के मेल🌳

💫हमारे जीवन में यह जानकारी रखना बहुत जरूरी है कि कौन-कौन से भोजन का मेल सही है या कौन-कौन से गलत। आयुर्वेद में भी भोजन के मेल पर बहुत सारी बातें बताई गई हैं। इसमें कई पदार्थ एक दूसरे से मिलकर जहर के सामान हो जाते हैं जैसे शहद और घी बराबर खाने से जहर बन जाता है।

💫भोजन के अलग-अलग तत्वों को पचाने के लिए अलग अलग पाचक रसों की जरूरत पड़ती है। श्वेतसार की पाचनक्रिया क्षार रस से होती है जबकि प्रोटीन को अम्ल पचाता है। अगर दोनों प्रकार के भोजन साथ साथ खाये जायेंगे तो दोनों के पाचक रस साथ साथ बनेंगे। इस तरह अम्ल रस और क्षार रस मिलकर प्रभावहीन हो जाते हैं जिससे प्रोटीन सड़नें शुरू हो जाते हैं। जिससे पाचनक्रिया काम नहीं करती है।

💫इसी प्रकार एक ही समय में कई वस्तुएं सब्जी, फल, अचार, दही, खीर, मिठाई, पापड़, आदि एक साथ खाने से रासायनिक क्रिया शुरू हो जाती है और पाचन तंत्र खराब हो जाता है।

💫एक समय में एक ही प्रकार का खाना खाना उचित आहार है। यह सही है मिश्रित भोजन गलत कदम है। एक टाईम में कम से कम खानों के मिश्रण को आसानी से पचाया जा सकता है।
💫भोजन में एक समय फल और एक समय सलाद लेना चाहिए। इसे एकाहार भी कहते हैं।

💫अनुचित मेल-
दूध और दही के साथ केला।
दूध या दही के साथ मूली।
दूध के साथ दही।
शहद के साथ गर्म जल व और कोई गर्म पदार्थ।
शहद और मूली।
खिचड़ी और खीर।
दूध के साथ खरबूजा, खीरा, ककड़ी।
दही, पनीर।
फलों के साथ सब्जियां।
रात में मूली या दही।
गर्म दही।
कांसे के बर्तन में दस दिन तक रखा हुआ घी।
दाल के साथ शकरकन्द, आलू, कचालू।
दाल और चावल या दाल और रोटी।
दूध या दही के साथ रोटी।
जानकारी-

💫जिन्हें रोटी और चावल के साथ दाल खानी हों उन्हें अच्छी मात्रा में सब्जी का भी सेवन करना चाहिए।
उचित मेल-
आम और गाय का दूध।
दूध और खजूर।
चावल और नारियल की गिरी।
दाल और दही।
अमरूद के साथ सौंफ।
बथुआ और दही का रायता।
गाजर और मेथी का साग।
दही और आंवला चूर्ण।
श्वेतसार के साथ साग सब्जी।
मेवे के साथ खट्टे फल।
दाल और सब्जी।
सब्जी व चावल की खिचड़ी।
रोटी के साथ हरे पत्ते वाली सब्जी।
अंकुरित दालें और कच्चा नारियल।
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⭐ बीमार और स्वस्थ की पहचान ⭐

👉परिचय-
आज के इस दौर में कई तरह की चिकित्सा पद्धतियां हैं जो किसी भी रोग को ठीक करने की शक्ति रखती हैं। आज जब हम बीमार पड़ते हैं और किसी डॉक्टर के पास जाते हैं तो वह बीमारी को ठीक करने के लिए दवाई आदि दे देता है। लेकिन वह दवाई हमारे रोग को दबा देती है और हम बाहरी तौर पर स्वस्थ हो जाते हैं। असल में हमें जो दवा दी जाती है, वह सिर्फ रिजल्ट ठीक करती है लेकिन रोग का कारण वहीं रहता है। यदि आप पूर्ण रूप से स्वस्थ होना चाहते हैं तो प्रकृति के कुछ नियमों का पालन करें।

👉यदि हम प्रकृति और आहार नियमों का पालन करें तो जीवन में कभी बीमार नहीं पड़ेंगे। वैसे भी मानव शरीर एक मशीन के समान है जिसमें अनेक अंग विभिन्न कार्यों को करते हैं। जिस प्रकार मशीन की देखभाल न करने पर उसमें खराबी आ जाती है उसी तरह शरीर की देखभाल न करने पर भी उसमें खराबी आ जाती है।

👉स्वास्थ्य क्या है?

इसके बारे में अलग-अलग पैथिज के अनुभवी अपनी-अपनी राय रखते हैं जैसे- डेंगू मच्छर आज के दौर में सबसे खतरनाक मच्छर माना जाता है। एलौपैथी के अनुसार- डेंगू मच्छर से बचने के लिए दवाईयों का सहारा लो, घर में मच्छर भगाने वाली मशीन और शरीर पर मच्छर दूर रखने वाली क्रीम आदि लगाएं। होम्योपैथिक के अनुसार-शरीर को जहां तक हो सके ठंड से बचाओ तो शरीर मजबूत रहेगा। आयु्र्वेद के अनुसार- पेट को साफ रखो। अन्य अनुभवियों के अनुसार- शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाओ। नैचर कहता है कि मेरे नियमों का पालन करो, बाकी सबकुछ अपने आप मैंटेन हो जाएगा। बिना किसी खर्च और एडीशनल वर्क के नैचरपैथी का सहारा लेकर आप खुद को और अपनों को स्वस्थ रख सकते हैं। हम आपको नैचरपैथी का ज्यादा से ज्यादा ज्ञान देकर नैचरपैथी का चिकित्सक बनाने जा रहे हैं।

👉स्वास्थ्य की रक्षा के लिए प्राकृतिक नियम-

👉स्वास्थ्य की रक्षा के लिए प्रतिदिन क्षमता के अनुसार कुछ व्यायाम करें।
पर्याप्त मात्रा में पौष्टिक भोजन लें।
शरीर को आवश्यकतानुसार आराम दें एवं भरपूर नींद लें।
मौसम के अनुकूल कपड़े पहने।
बुरी आदतों से बचें।
तनावमुक्त रहें और इसके लिए प्राणायाम का अभ्यास करें।
उठने-बैठने की सही मुद्रा अपनाएं।
शरीर की नियमित मालिश करवाएं।
शरीर को साफ व स्वच्छ रखें।
सप्ताह में एक बार उपवास अवश्य रखें।
अच्छा स्वास्थ्य वह है जिसमें शरीर एवं मस्तिष्क दोनों स्वस्थ हों। यदि शरीर हष्ट-पुष्ट हो परंतु मस्तिष्क अस्वस्थ हो तो ऐसे शरीर को स्वस्थ नहीं माना जा सकता। हमारे द्वारा किया गया कोई भी कार्य मस्तिष्क के आदेश पर ही होता है इसलिए मस्तिष्क अस्वस्थ रहने पर कोई भी कार्य पूर्ण नहीं हो सकता। मस्तिष्क के समान ही शरीर अस्वस्थ रहने पर भी कोई कार्य पूर्ण नहीं हो सकता। इसलिए अच्छे स्वास्थ्य के लिए शरीर एवं मस्तिष्क दोनों का स्वस्थ रहना आवश्यक है। अक्सर लोगों को स्वास्थ्य के महत्व का पता ही नहीं होता और अपनी इस अज्ञानता के कारण वे हमेशा स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह बने रहते हैं।

👉यही लापरवाही दिन-प्रतिदिन शरीर को अस्वस्थ बनाती चली जाती है और लोगों का जीवन अनेक कष्टों से भर जाता है। किसी भी स्वस्थ शरीर के लिए आवश्यक है कि वह स्वास्थ्य के नियमों का पालन करें। यदि हम स्वास्थ्य नियमों को अपने जीवन का एक अंग मानकर पालन करें तो किसी भी प्रकार की बीमारी की संभावना ही समाप्त हो जाएगी। जब हम स्वस्थ होंगे तब अपने शरीर व मस्तिष्क का पूर्ण प्रयोग कर सकेंगे। वैसे कहा भी गया है- स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन निवास करता है और स्वस्थ मन में ही उच्च विचार पनपते हैं। अतः स्वास्थ्य नियमों का पालन करना ही सुखमय जीवन की कुंजी है।

👉कुछ ऐसे प्रश्न हैं जो आप अपने आपसे पूछकर अपने स्वास्थ्य संबंधी सवालों का पता लगा सकते हैं जैसे-
क्या आप अपनी वास्तविक उम्र से कम दिखते हैं?
क्या आपका शारीरिक व्यक्तित्व सामान्य है?
क्या आपके चेहरे की रंगत लालिमायुक्त है?
क्या आपकी आंखों में जीवन की चमक है?
क्या आपकी मुखमुद्रा प्रसन्नचित्त है?
क्या आप अपने शरीर में चुस्ती-फुर्ती व शक्ति का अनुभव करते हैं?
क्या आप हमेशा स्वच्छ रहते हैं?
आपका पेट ठीक रहता है तथा आपको खुलकर भूख लगती है?

👉आपको समय से अच्छी नींद आती है?
शौच साफ, बंधा हुआ एवं नियमित होता है?
क्या भूख प्राकृतिक रूप से लगती है?
दिन-भर शरीर में चुस्ती-फुर्ती बनी रहती है?
क्या पेट छाती से कम है?
मादक एवं उत्तेजक पदार्थों की चाह नहीं हैं।
रचनात्मक कार्यों में लगे रहने की प्रवृत्ति हैं?
चेहरे पर मुस्कान बनी रहती है?
सभी शारीरिक क्रियाएं सामान्य हैं?
इन सभी प्रश्नों में से यदि आपका उत्तर सकारात्मक है तो आप निश्चित ही स्वस्थ हैं परंतु एक भी प्रश्न के उत्तर में यदि आपका उत्तर नकारात्मक हो तो आप पूर्ण स्वस्थ नहीं हैं।
अस्वस्थ व्यक्ति की पहचान क्या है?
यदि शारीरिक क्रियाएं असामान्य हो।

👉चेहरे एवं आंखों की चमक समाप्त हो गई है और आंखों के नीचे काले घेरे पड़ रहे हैं।
अधिक चिड़चिड़ापन, बात-बात पर गुस्सा करना एवं निराशापूर्ण बातें करना।
छोटे-छोटे कार्यों में थकावट महसूस करना एवं अधिक हताश रहना।
भूख न लगना एवं नींद न आना।
मल पतला या गांठ के रूप में आना।
भूख न लगना।
पेट छाती से बड़ा होना।
मन में हमेशा नकारात्मक विचार उत्पन्न होना।
छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा होना।
आलस्य छाया रहना।
नशीले पदार्थों का सेवन करना।
मोटापा, अधिक या कम शारीरिक वजन।
अब हम स्वस्थ और अस्वस्थ शरीर की पहचान कैसे करेंगे? किसी व्यक्ति को सीधे तौर पर देखकर यह नहीं कहा जा सकता है कि वह स्वस्थ है या अस्वस्थ। कई ऐसे लोग होते हैं जो देखने में तो स्वस्थ लगते हैं लेकिन आंतरिक रूप से अस्वस्थ होते हैं।

👉यह बात उन लोगों को पता नहीं होती लेकिन उनमें अस्वस्थता के लक्षण झलक रहे होते हैं जैसे- आलस्य छाया रहना, काम में मन न लगना, मानसिक परेशानी आदि। कई बार बाहरी तौर पर स्वस्थ दिखाई देने के कारण लोग उसकी ओर ध्यान नहीं देते और न ही वे स्वयं उस पर ध्यान देते हैं। ऐसे में कोई बाहरी तौर पर स्वस्थ दिखाई देता है तो वे स्वस्थ ही होगा, ऐसा नहीं है।
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❤️‍🔥 प्रकृति के नियम ❤️‍🔥

स्वास्थ्य से सम्बंधित नियमों का पालन तथा किसी भी काम में अति न करना प्राकृतिक चिकित्सा का मुख्य सिद्धांत होता है। कहने को तो यह बहुत ही साधारण सी बात लगती है। परन्तु वास्तव में ऐसा है नहीं। प्रकृति के नियमों को तोड़ने से बीमारियां पैदा होती हैं जबकि प्रकृति के नियमों का पालन करने से हमारे स्वास्थ्य की रक्षा होती है। प्रकृति के नियमों का पालन करने के लिए आवश्यक होता है कि हमें प्राकृतिक चिकित्सा के महत्वपूर्ण सिद्धांतों के बारे में जानकारी हो जो निम्नलिखित है-

किसी भी रोगों से छुटकारा पाने की शक्ति हमारे शरीर के अंदर ही उपस्थिति होती है। बशर्ते उसका सही तरह से उपयोग किया जा सके।

शरीर का बीमारियों से ग्रस्त होने का प्रमुख कारण रक्त का दूषित होना होता है।

रोगी के शरीर और मन दोनों का उपचार एक साथ ही करना चाहिए।

बिना सफाई के चिकित्सा नहीं हो पाती है।
रोगी को अपना उपचार स्वयं करना चाहिए क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति अपने स्वास्थ्य के लिए स्वयं उत्तरदायी होता है।
रोगी के रोग से ठीक होने की आंतरिक शक्ति :

प्रकृति के नियमों के अनुसार जीवन व्यतीत करने वाला व्यक्ति हमेशा स्वस्थ रहता है। हमारे शरीर की प्राणशक्ति के प्रवाह से हमारा जीवन पृथ्वी पर व्याप्त वातावरण के अनुसार ढल जाता है। यह प्राणशक्ति मानव शरीर और वातावरण में लय उत्पन्न करती है।

यदि हमारे शरीर की जीवनी शक्ति अपने आपको वातावरण के अनुरूप नहीं ढाल पाती, या गलत ढंग से ढालती है, तो शरीर अस्वस्थ होकर किसी रोग से ग्रस्त हो जाता है। शरीर को प्रकृति के नियमों के अनुरूप चलाने के लिए एक निश्चित मात्रा में ऊर्जा की आवश्यकता होती है। किसी भी दवा का सेवन करने से यह ऊर्जा नहीं आती है। स्वरक्षित प्राणशक्ति ही सभी रोगों से हमारे शरीर की रक्षा करती है। शरीर के अंगों तथा सेलों की स्वरक्षित शक्ति शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा देती है।

संरक्षक सेल (कोशिका) :
कभी-कभी किसी लड़के को चोट आदि लग जाने पर तथा घाव आदि हो जाने पर वह दवा का सेवन करने से इंकार कर देता है तथा घाव का उपचार भी नहीं करता है।

 आश्चर्य की बात है कि कुछ ही दिनों में उसका घाव भी ठीक हो जाता है। ऐसा होने का भी कारण होता है जब बच्चे के शरीर में कहीं पर चोट लगती है तो रक्त में विद्यमान छोटे-छोटे सेल पूरी शक्ति के साथ काम करते हैं। कच्चे घाव के पास में सेल्स अपेक्षाकृत बहुत तेजी से बढ़ते हैं तथा धीरे-धीरे नई त्वचा से घाव भर जाता है। इन सेल्स (कोशिकाओं) को पुलिस सेल्स कहा जाता है। जब तक घाव भर नहीं जाता है यह त्वचा का संक्रमण होने से बचाते हैं।

गम्भीर चोट लगने पर जब शरीर की मांसपेशियां क्षत-विक्षत हो जाती हैं तो अंदर के तंतुओं में घाव को भरने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। हड्डी टूटने के कुछ समय बाद स्वयं ही कोमल तंतुओं से जुड़ जाती है। इन तंतुओं की परिपक्तवा के लिए शरीर में मौजूद खनिज पदार्थ उपयोगी साबित होते हैं। रीढ़ की हड्डी तथा दिमाग के नाड़ी तंतुओं को छोड़कर शरीर के किसी भी भाग के तंतु चोट लगने पर नई त्वचा बनाने की क्षमता रखते हैं।

प्राणशक्ति- एक आश्चर्य
प्राय: ऐसा देखने और सुनने में आता है कि सुदूरवर्ती स्थानों या गांवों में, जहां अन्य कोई चिकित्सीय सहायता उपलब्ध नहीं होती है, वहां के लोग गम्भीर बीमारियों से ग्रस्त होने और दुर्घटना होने पर भी ठीक हो जाते हैं।

इस प्रकार की घटनाओं में प्रकृति द्वारा प्रदान की गई प्राण-शक्ति ठीक होने की प्रक्रिया में अपना काम करती है। इन विषम परिस्थितियों में से गुजरने वाला व्यक्ति रोगों से मुक्त होने के बाद अधिक कमजोरी का अनुभव करता है लेकिन चूंकि प्रकृति के द्वारा उसकी चिकित्सा हुई होती है इस कारण से उसको कोई भी गम्भीर रोग होने की आशंका नहीं होती है।

 प्राकृतिक रूप से ठीक होने की प्रक्रिया में दवाओं के उपयोग से विभिन्न प्रकार के विकार उत्पन्न हो सकते हैं।
शरीर की जीवनी शक्ति का कमजोर होना :

प्राकृतिक उपचार के दौरान भी कुछ व्यक्तियों की मृत्यु हो सकती है। यह अन्तर प्राण-शक्ति की अधिकता या कमी के कारण होता है। इसे इस तरीके से समझा जा सकता है कि कुछ व्यक्ति गम्भीर रूप से घायल होने पर तथा कैंसर जैसी असाध्य बीमारी से पीड़ित होने के बावजूद ठीक हो जाते हैं जबकि दूसरे लोग मर जाते हैं।

प्रकृति के अनुसार जीवनयापन न करने से प्राण-शक्ति कम होती जाती है। इस कारण व्यक्ति धीरे-धीरे कमजोर होता जाता है। संक्रमण के प्रभाव के कारण रोगी की शारीरिक शक्ति धीरे-धीरे क्षीण होने लगती है और वह विभिन्न रोगों से ग्रस्त हो जाता है। जब तक रोगी का शरीर और आत्मा दोनों एक समान रूप में होते हैं तभी तक रोगी की प्राणशक्ति ठीक रहती है।

यदि हम प्राकृतिक नियमों के अनुसार अपना जीवन यापन करना छोड़ देते हैं तो हमें विभिन्न शारीरिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। 

इस दौरान रोगी के शरीर की प्राण-शक्ति रोगी को फिर से स्वस्थ करने का प्रयास करती है। तब जो विषैले द्रव्य शरीर में एकत्र हुए हैं, वे दर्द और फफोलों के रूप में बाहर निकलते हैं। यह शरीर में विजातीय द्रव्यों को रहने नहीं देती है। 

इससे शरीर में बीमारी होने के सभी कारण नष्ट हो जाते हैं। इन लक्षणों को प्राकृतिक चिकित्सा में हीलिंग क्राइसिस नाम से जाना जाता है।

बीमारियों का प्रमुख कारण रक्त का विषैला होना :
शरीर के दूषित पदार्थों को निकालने वाले प्रमुख अवयव निम्नलिखित हैं-

फेफडे़ : फेफड़े श्वास के द्वारा शरीर से कार्बन डाईआक्साइड को बाहर निकालते हैं।

गुर्दे : गुर्दे मूत्र और नमक को शरीर से बाहर निकालते हैं।
आंते : खाना पचने के बाद जो अवशिष्ट शेष बचा रह जाता है, आंते उसे मल के साथ पेट से बाहर निकाल देती हैं।
त्वचा : त्वचा पसीने की सहायता से शरीर के दूषित तत्वों को शरीर से बाहर निकाल देती है।

यदि उपर्युक्त अंगों पर जरूरत से अधिक भार पड़ता है, तो नसों में रुकावट आ जाती है जिससे खून का बहाव ठीक प्रकार से नहीं हो पाता है जिसके कारण खून में विषैले पदार्थ मिल जाते हैं। 

अधिक मात्रा में किया गया ऐसा भोजन, जिसकी गुणवत्ता में कमी हो, साथ में व्यायाम का भी अभाव नसों में रुकावट पैदा करता है। इसके परिणामस्वरूप श्वास प्रक्रिया सम्बंधी अवयवों, जैसे नाक और गले में सूजन हो जाती है, त्वचा शुष्क हो जाती है तथा बहुत अधिक तैलीय हो जाती है, लीवर में भी सूजन उत्पन्न होने से उसमें वृद्धि हो जाती है, आंतों में कब्ज हो जाता है और शरीर के अवशिष्ट पदार्थ के विषैले तत्व खून के प्रवाह में मिल जाते हैं। इस स्थिति में ऑक्सीजन द्वारा बिगड़ी हुई प्रणाली को सुधारने के लिए व्यायाम की आवश्यकता होती है।

रोगी के शरीर और मन की चिकित्सा एक साथ करना:
हमारे शरीर और मन की इकाई को वातावरण के अनुकूल होना चाहिए। किसी भी तरह के हानिकारक तत्व बिना मन को प्रभावित किये हुए शरीर में प्रवेश नहीं कर सकते हैं। 

हमारे भाव शारीरिक क्रियाकलापों को प्रभावित करते हैं। किसी भी व्यक्ति का मानसिक व्यवहार यह तय करता है कि उसका शरीर किसी बीमारी से कितना प्रभावित हो सकता है। अधिकतर अधिक समय तक चलने वाली बीमारियों का निश्चित रूप से भावनाओं से भी सम्बंध होता है।

 साधारण सर्दी, जुकाम, पेट का दर्द और सिर का दर्द भी भावनाओं से सम्बन्धित होता है। मानसिक तनाव, चिंता, डर, ईर्ष्या और नफरत हमारे शरीर को प्रभावित करते हैं तथा शरीर के रक्त को विषैला बनाते हैं। हमारे शरीर के रक्त के विषैला होने से शरीर में विभिन्न प्रकार के घातक रोग उत्पन्न होते हैं।
शरीर का साफ-सुथरा होना :

प्रत्येक व्यक्ति अपने बाहरी अंगों की अच्छी प्रकार से सफाई करता है। हाथ या पैर में थोड़ी सी भी धूल या मिट्टी लग जाने से हम उसे तुरन्त साफ करते हैं। इसी प्रकार से आंतरिक अंगों जैसे पाचनतंत्र आदि के सफाई की भी आवश्यकता होती है। यदि आंतरिक अंगों को देख पाना सम्भव होता तो हमें आंतरिक अंगों की सफाई के बारे में महसूस होता है। हमारे शरीर के आंतरिक अंगों में भी दिमाग होता है। शरीर की अस्वास्थ्यकर भावनाएं तथा विचार हमारे दिमाग को इतना अधिक प्रभावित करते हैं कि हार्मोन्स का संतुलन बिगड़ जाता है और शरीर का रक्त संचार प्रभावित हो जाता है।

शरीर के आंतरिक अंगों की सफाई करना :
जिस प्रकार से हम किसी भी मशीन को साफ करने के लिए उसके सभी पुर्जों को खोलते हैं तथा उसके एक-एक हिस्से को साफ करते हैं। 

उसी प्रकार से हमारा शरीर भी एक जटिल मशीन के समान होता है लेकिन अंग अलग नहीं किये जा सकते हैं, फिर भी शरीर की आंतरिक सफाई बहुत आसान है क्योंकि हमारे शरीर की सफाई जल के अधिक सेवन करने और विश्राम करने से हो जाती है।

शरीर की आंतरिक सफाई के लिए उपवास और जल का प्रयोग :
उपवास हमारे दैनिक जीवन के लिए बहुत अधिक लाभकारी होता है। हम उपवास रखकर केवल जल पीकर शरीर की सफाई कर सकते हैं। हमारे शरीर में लगभग 70 प्रतिशत द्रव्य होता है, जिसमें रक्त, मूत्र, जल तथा पित्त आदि शामिल होते हैं। 
हमारे शरीर में रक्त के संचरण की प्रक्रिया चलती रहती है। इस प्रक्रिया में रक्त में विभिन्न प्रकार के विषैले पदार्थ जमा हो जाते हैं जिसे शरीर से बाहर निकालना अधिक आवश्यक होता है। यदि उनको न निकाला जाए तो, वे शरीर में बीमारी उत्पन्न करते हैं।
 उपवास करने से शरीर के पाचनतंत्र को बहुत ही विश्राम मिलता है तथा जो अवशेष भोजन पचने के बाद शरीर में बचे रह जाते हैं, विश्राम उनको बाहर निकालने में मदद करता है। पाचनतंत्र को ठीक करने का यह सबसे अधिक वैज्ञानिक तरीका है।

जब हम उपवास रखते हैं तो हमें बार-बार पेशाब करने के लिए बाहर जाना पड़ता है। शरीर के आंतरिक अंगों की थकी हुई मांसपेशियों और तंतुओं को ठीक करने के लिए उपवास के दौरान जल और द्रव्य पदार्थों का अधिक मात्रा में सेवन करने से शरीर में विद्यमान विषैले पदार्थ अधिक मात्रा में शरीर से बाहर निकलते हैं। 

उपवास के दौरान सांस से दुर्गंध आती है। ऐसा होने का कारण यह है कि शरीर में एकत्रित गंदी गैसों को उपवास के दौरान ही बाहर निकलने का मौका मिलता है। सभी धर्मों में एक सप्ताह या पन्द्रह दिन के अंदर एक बार उपवास करने का नियम है। इसका मुख्य उद्देश्य शरीर की सफाई करना होता है। उपवास रखकर शरीर की सफाई करनी चाहिए तथा ध्यान करके और प्रार्थना करके मन की सफाई करनी चाहिए।

वर्तमान समय की भाग-दौड़ भरी जिंदगी में सफाई के ये तरीके बहुत कठिन दिखाई पड़ते हैं, लेकिन इनसे होने वाले लाभों के मद्देनज़र इन्हें कभी-कभी थोडे़ से समय के लिए अपनाया जा सकता है। अधिकांश लोगों को यह बात हजम नहीं होगी किन्तु यह सच्चाई है कि एक व्यक्ति बिना भोजन किये हुए महीनों तक जीवित रह सकता है। जिस किसी भी व्यक्ति ने उपवास रखा हो वहीं उपवास के महत्व को समझ सकता है।
 
ऐसा अनुभव उन लोगों को होता है जो थोड़ा सा बीमार होने या अत्यधिक थकान होने के कारण एक दिन भोजन नहीं करते हैं। ऐसी स्थिति में ताजा पानी, फलों का रस और गर्म दूध पीने से लाभ मिलता है। यदि किसी को भूख न लग रही हो तो इसका तात्पर्य यह होता है कि हमारे पाचनसंस्थान को आराम करने की आवश्यकता है। 

ऐसा होने पर हमें अधिक से अधिक तरल पदार्थों का सेवन करना चाहिए। यदि हम भूख न लगने के बावजूद भी भोजन करते हैं तो इससे हमारे शरीर की थकान अधिक बढ़ जाती है जिसके कारण बहुत अधिक नींद आती है। लेकिन इससे हमारा स्वास्थ्य खराब हो जाता है।

उपवास रखने और अधिक तरल पदार्थों का सेवन करने से शरीर के दूषित तत्व शरीर से बाहर निकल जाते हैं। लेकिन आंतों की संरचना इस प्रकार की होती है कि उसकी ठीक प्रकार से पूरी सफाई नहीं हो पाती है। इसके लिए एनिमा लेने की आवश्यकता होती है।

जब शरीर इन दोनों पद्धतियों (उपवास और अधिक तरल पदार्थों का सेवन) से दूषित तत्वों से मुक्त हो जाता है, तब कैंसर जैसी असाध्य बीमारियां भी ठीक हो जाती हैं। ऐसे बहुत से रोगी हैं जिनकी असाध्य बीमारियां उपवास, एनिमा, ताजे जल तथा फलों के रस को सेवन करने से दूर हो जाती हैं।
उपवास और भूखे रहना :

उपवास और भूखा रहने में अन्तर होता है। हम प्रतिदिन जो भोजन ग्रहण करते हैं, वह पूरी तरह से पच नहीं पाता है। इसका कुछ हिस्सा लीवर में तथा मांसपेशियों के तंतुओं में इकट्ठा हो जाता है। इस भोजन को जब तक प्रयोग में नहीं लाया जाता है तब तक यह एकत्र होता रहता है। जब कभी हम उपवास रखते हैं तो उस दौरान हमारा शरीर अपना भोजन इसी संचित कोष से लेता है। जब एकत्र हुआ भोजन समाप्त हो जाता है तो शरीर अपनी मांसपेशियों के तंतुओं पर भोजन के लिए निर्भर होता है।

 यह अवस्था भूखा रहने की होती है।
यदि हम चाहे तो उपवास रखकर किसी भी बीमारी को दूर कर सकते हैं।
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💫उपवास और ताली बजाने का महत्व 💫

💕उपवास- उपवास का महत्व सभी धर्मों में माना जाता है। जिस तरह उपवास की धार्मिक तौर पर मान्यता है उसी तरह शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भी यह बहुत खास माना जाता है। उदाहरण- नवरात्रों के दिनों में जब हम पूरे नौ दिनों तक उपवास करते हैं तो उस समय सिर्फ फलाहार का सेवन किया जाता है। इससे क्या होता है कि नौ दिनों तक सिर्फ फलाहार का सेवन करने के कारण शरीर की जो वेस्टेज थी वो बाहर निकल गई तथा बाहर की कोई वेस्टेज शरीर में नहीं बन पाई। इससे क्या होगा कि न तो शरीर में वेस्टेज जमा होगा और न ही किसी तरह का रोग उत्पन्न होगा। सामान्यतः कोई भी व्यक्ति शरीर में वेस्टेज जमा होने से रोगग्रस्त हो जाता है।

💕शरीर में जब भी किसी तरह की गड़बड़ी पैदा होती है तो शरीर हमे उसका इंडीकेशन दे देता है और इसमें सबसे पहला इंडीकेशन आता है कि हमारी भूख कम हो गई है। ऐसे में यदि हमे खाने के लिए कहा जाता है तो खाना खाने की बिल्कुल भी इच्छा जागृत नहीं होती। प्रकृति कहती है कि अगर आपकी पचास प्रतिशत भूख कम हो गई हो तो आप एक समय का खाना छोड़ दें। इससे आप जीवन में कभी बीमार नहीं पड़ेंगे। लेकिन हम क्या करते हैं कि जिस दिन हमे इस तरह का इंडीकेशन मिलता है, हम उस दिन चटपटी चीजें मंगाकर या बनवाकर खा लेते हैं।

💕यदि हम यहां पर चूक जाते हैं- जिसे मेडिकल भाषा में बीमारी और नेचरपैथी में शरीर की क्रियाएं बोलते हैं, उस पर ध्यान नहीं देते हैं तो वह बड़ी बीमारी के रूप में प्रकट हो जाता है। यदि पेट में विकार हो गया हो तो विकार होने के बाद भोजन डाईजेस्ट नहीं हो पाएगा। ऐसे में शरीर के विकार को निकालने के दो रास्ते हैं- पहला लैट्रिन के रास्ते और दूसरा मुंह के रास्ते। यदि लैट्रिन के रास्ते विकार को बाहर निकालते हैं तो उसे लगभग 33 फुट लम्बी दूरी तय करनी पड़ती है। जबकि इस विकार को मुंह के रास्ते निकालने के लिए लगभग एक फुट की दूरी तय करनी पड़ती है अर्थात उल्टी करनी पडती है।

💕यदि अपने आप उल्टी आती है तो आने दें और अगर नहीं आती है तो पानी पीकर उल्टी करें। उल्टी जितनी मर्जी हो उतनी करें तो इसका कोई नुकसान नहीं है बल्कि इससे शरीर की गंदगी बाहर निकल जाती है। इसी तरह यदि लूजमोशन हो जाए तो उसे दवाओं से दबाना नहीं चाहिए। भरपेट पानी पीएं और जैसे ही लैट्रिन आए तुरंत ही लैट्रिन जाएं। इस तरह से पूरी आंतें साफ हो जाएगी। लेकिन अक्सर हम दवाईयों के प्रयोग से इसे दबा देते हैं जिससे यह रुक जाता है और शरीर में जमा होकर पुराना रोग बन जाता है। डायबिटीज, स्टोन, ट्यूमर आदि रोग शरीर से निकलने वाले विकार को दबाने का ही नतीजा है। नहीं तो ट्यूमर एक दिन में नहीं बन जाता, वर्षों लगते हैं उसे बनने में।

💕विश्राम- विश्राम का जीवन में बहुत ही ज्यादा महत्व माना जाता है क्यों ? ऐसा इसलिए होता है कि जब हम पूरे दिन काम करते हैं तो हमारे शरीर के बहुत से सेल्स नष्ट हो जाते हैं और कुछ बाईप्रोडक्ट बनने लगते हैं जैसे- कैमिकल आदि। अब होगा क्या कि हम जितना ज्यादा काम करेंगे हमारे शरीर में उतना ही वेस्टप्रोडेक्ट बनता जाएगा लेकिन पूरी तरह व्यस्त रहने के कारण शरीर को उसे बाहर निकालने का समय ही नहीं मिल पाएगा। इसी को देखते हुए प्रकृति ने विश्राम करने का नियम बनाया है ताकि जब हम विश्राम करें तो हमारी सारी क्रियाएं बंद हो जाए और यह वेस्टप्रोडेक्ट बाहर निकल जाए।
कई बार ऐसा भी होता है कि हम मानसिक या शारीरिक रूप से थक जाते हैं, कई बार काम के बोझ के कारण भी थकावट आ जाती है ऐसी स्थिति में विश्राम कर लेना ही उचित है।

💕 विश्राम के लिए श्वासन में लेटना सबसे उपयुक्त माना जाता है। यदि अधिक मानसिक कार्य के कारण तनाव है तो ऐसे में भी श्वासन में लेट सकते हैं। लेकिन श्वासन में आप केवल घर पर ही लेट सकते हैं, ऑफिस में या कहीं बाहर नहीं लेट सकते। ऐसे में श्वासन के स्थान पर अंजनिमुद्रा का इस्तेमाल कर सकते हैं। इससे भी मानसिक तनाव दूर होता है।

💕इसके लिए अपने हाथों को कटोरी की मुद्रा में बना लें, फिर आंखों को बंद करके एक हाथ से एक आंख को ढकें इससे माथे पर आपकी अंगुलियां आ जाएंगी। अब इसी तरह दूसरे हाथ को दूसरी आंखों पर टिकाएं जिससे माथे के ऊपर आपकी अंगुलियां आ जाएगी। दो से दस मिनट तक इस स्थिति में रहने के बाद आपकी सारी मानसिक परेशानी दूर हो जाएगी। इसके बाद अपने काम को शुरू कर सकते हैं। अब जो नींद है वह रात के समय बहुत जरूरी है। जितनी गहरी नींद आएगी उतना ज्यादा हमारा शरीर डिटॉक्सीफाई होगा और जितना ज्यादा शरीर डिटॉक्सीफाई होगा उतनी ज्यादा फ्रेशनेश रहेगी।

💕यदि रात को पेशाब करने या पानी पीने के लिए उठ गए तो इसका अर्थ है कि आपको गहरी नींद नहीं आई है। भोजन में जितना ज्यादा वेस्टप्रोडेक्ट होगा उतनी गहरी नींद आएगी लेकिन यह आलस्य वाली नींद होगी। स्टूडेंट, डॉक्टर, इंजीनियर, साइंटिस्ट आदि जिन्हें अधिक मानसिक कार्य करना पड़ता है, अधिक देर तक जागना पड़ता है। ऐसी व्यक्तियों को नैचुरल डाईट पर रहना चाहिए ताकि शरीर में वेस्टप्रोडेक्ट कम बने।

💕अगर वेस्टप्रोडेक्ट शरीर में कम बनेगा तो नींद भी आवश्यकता से कम आएगी। हम क्या करते हैं कि अक्सर नींद को खत्म करने के लिए चाय-कॉफी का इस्तेमाल करते रहते हैं। लेकिन इसके स्थान पर फलाहार ले लिया जाए तो वेस्टप्रोडेक्ट बिल्कुल ही कम हो जाएंगे और शरीर को कोई नुकसान भी नहीं होगा। यदि कोई फंक्सन है, शादी-पार्टी और देर रात तक जागना हो तो सुबह से ही फलाहार, जूस आदि लेना शुरु कर दें। इससे न आलस्य आएगा और न ही थकावट होगी।

💕मौन की शक्ति- मौन की शक्ति भी अपने आप में खास मानी जाती है। बोलने में शरीर की बहुत एनर्जी लगती है इसलिए अगर कम शब्दों में अपनी बात कही जाए तो ज्यादा अच्छा रहता है। यदि आपको मौन की शक्ति देखनी है तो आप एक दिन मौनव्रत धारण करें और दूसरे दिन देखें कि आप अपने आपमें कितनी फ्रेशनेश महसूस कर रहे हैं। हम बेमतलब में अधिक बोलकर अपनी एनर्जी वेस्ट करते रहते हैं। इसलिए अपनी एनर्जी को बचाने के लिए कम बोलना चाहिए।

💕ताली बजाना- सिर्फ ताली बजाकर ही किसी भी रोग से छुटाकारा पाया जा सकता है। हमारे देश के मंदिरों में या अन्य स्थानों पर आरती या भजन गाते समय ताली बजाने की जो प्रथा है वह प्राचीन काल के वैज्ञानिकों ने शरीर को स्वास्थ्य रखने के लिए बनाई है। ताली बजाने से न सिर्फ रोगों से रक्षा होती है बल्कि कई रोगों का इलाज भी हो जाता है जैसे- कि ताला खोलने के लिए चाबी की आवश्यकता होती है वैसे ही कई रोगों को दूर करने में यह ताली, चाबी का ही काम नहीं करती है बल्कि कई रोगों का ताला खोलने वाली होने से इसे मास्टर की भी कहा जा सकता है। हाथों से नियमित रूप से ताली बजाकर कई रोग दूर किए जा सकते हैं। स्वास्थ्य की समस्याओं को सुलझाया जा सकता है। ताली दुनिया का सर्वोत्तम एवं सरल सहज योग है और प्रतिदिन यदि नियमित रूप से 2 मिनट भी तालियां बजाएं तो फिर किसी हठयोग या आसनों की जरूरत नहीं होती है।

💕लगातार ताली बजाने से रक्त के श्वेत कणों को शक्ति मिलती है जिसके परिणामस्वरूप शरीर में रोग-प्रतिरोधक शक्ति की वृद्धि होती है इससे शरीर रोगों के आक्रमण से अपना बचाव कर रोगी होने से बचने की क्षमता प्राप्त कर लेता है। ध्यान के अभ्यास में भी ताली की भूमिका महत्वपूर्ण है। ध्यान लगाते समय हमारी आंखें तो बंद होती हैं लेकिन कान खुले होते हैं। कान बंद करने का कोई उपाय नहीं है अतः जरा-सी आवाज होते ही हमारा ध्यान भंग हो जाता है। लेकिन आंखें बंद कर हम तेजी से ताली बजाते हैं तो हमारे कान ताली की आवाज सुनने में व्यस्त हो जाते हैं और दूसरी आवाजों की तरफ ध्यान नहीं देते हैं।

💕 ऐसे में बाहरी आवाजों से संपर्क टूट जाने के कारण हमारा ध्यान भंग नहीं होता। धीरे-धीरे तालियां बजाने की अवधि बढ़ाकर हम ध्यान की अवधि को भी बढ़ा सकते हैं।
हथेलियों में शरीर के सभी आंतरिक उत्सर्जन संस्थानों के बिंदु मौजूद होते हैं और ताली बजाने से जब इन बिंदुओं पर बार-बार दबाव पड़ता है तो सभी आंतरिक संस्थान ऊर्जा पाकर अपना काम ठीक प्रकार से करने लगते हैं जिससे शरीर स्वस्थ एवं निरोग बना रहता है। ताली बजाने से शरीर का मोटापा कम होता है, विकार नष्ट होते हैं और वात, पित्त और कफ का संतुलन ठीक रहता है।

💕जिस प्रकार हम किसी कपड़े को साफ करने अर्थात धूल झाड़ने के लिए झटकारते हैं उसी प्रकार ताली बजाने से जो झटके लगते हैं उससे हमारे शरीर की भी सफाई होती है। लेकिन हमें एक बात का ध्यान रखना होगा कि ताली बजाने के इस प्राकृतिक साधन का उपयोग करने का लाभ तभी मिल सकता है जब हमारी दिनचर्या में अप्राकृतिक साधनों का उपयोग कतई न हो। जब हम प्रकृति का नाश करते हैं तो जाहिर है कि प्रकृति भी हमसे बदला लेगी और हमारी प्रकृति को विकृति में बदल देगी, विकृति ही व्याधि अर्थात रोग है और विकारग्रस्त होना ही रोगी होना है।

💕ताली बजाना मन की प्रसन्नता का भी प्रतीक है। इस कारण खुशी में ताली बजाई जाती है। आप सभी को भी प्रतिदिन प्रसन्न होकर ताली बजाना चाहिए।
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🏋️आसान हेल्थ टिप्स 🏋️

☑️इन दिनों लोगों ने अपनी लाइफस्टाइल ऐसी बना ली है कि दिनों दिन वे नई-नई परेशानियों और बीमारियों से घिरते जा रहे हैं। चाहे खान-पान हो या आरामदायक जीवनशैली। और तो और शहरी वातावरण भी उन्हें इस तरह की दिनचर्या बनाने में काफी मदद की है। सभी ऐशोआराम की चीजें उन्हें घर बैठे हासिल हो जाती है। उन्हें उठकर कहीं जाने की जरूरत भी नहीं पड़ती। नतीजा....

☑️जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां। आइए नये साल पर अपनी आरामदायक जीवनशैली को बदलने के लिए कुछ संकल्प लें। यहां 15 आसान हेल्थ टिप्स दिये जा रहें हैं जिन्हें अपनाकर आप अपनी फिगर को मेंटन तो कर ही सकती हैं। साथ ही इन्हें अपनाकर आप दिन भर तरोताजा भी महसूस करेंगीं।

☑️प्रतिदिन वॉक करें। अगर हो सके तो फुटबॉल खेलें यह एक प्रकार का एक्सरसाइज ही है।

☑️ऑफिस में या कहीं भी जाएं तो लिफ्ट के बदले सीढिय़ों का इस्तेमाल करें।

☑️अपने कुत्ते को वॉक पर खुद लेकर जाएं। बच्चों के साथ खेलें, लॉन में नंगे पांव चलें, घर के आसपास पेड़ पौधे लगाऐं, यानि कि वो सब करें जिनसे आप खुद को एक्टिव रख सकें।

☑️ऐसी जगह एक्सरसाइज न करें जहां भीड़भाड़ ज्यादा हो।
तले-भुने भोजन, और अन्य फैटी चीजों से परहेज करें यह बहुत से बीमारियों की जड़ होती है।

☑️डेयरी प्रोडक्ट्स का सेवन करें। जैसे कि चीज, कॉटेज चीज, दूध और क्रीम का लो फैट प्रोडक्ट आदि।

☑️यदि खाना ही है तो, मक्खन ,फैट फ्री चीज और मोयोनीज का लो फैट उत्पाद प्रयोग में लाऐं।

☑️तनाव हमारी जिंदगी में काफी निगेटिव असर डालता है। विशेषज्ञों के अनुसार तनाव कम करने के लिए सकारात्मक विचार बहुत मददगार साबित हो सकते हैं।

☑️तनाव कम करने के लिए रोज कम से कम आधा घंटा ऐसे काम करें, जिसे करने में आपको मन लगता हो।

☑️तनाव कम करने के लिए आप योग का भी सहारा ले सकते हैं।
गुस्सा तनाव बढ़ाने में अहम भूमिका निभाता है इसलिए गुस्सा आने पर स्वंय को शांत करने के लिए एक से दस तक गिनती गिनें।

☑️उन लोगों से दूर रहने की कोशिश करें जो आपके तनाव को बढ़ाते हों।

☑️धूम्रपान से परहेज करें। धूम्रपान से शरीर और उम्र पर असर तो पड़ता ही है, साथ ही फेफड़ों का कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी भी हो सकती है।

☑️धूम्रपान में कमी लाने के लिए उसकी तलब लगने पर सौंफ आदि का सेवन करें।

☑️मार्केट में भी आजकल बहुत से प्रोडक्ट मिलने लगे हैं जो धूम्रपान की तलब को कम करते हैं।
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❤️‍🔥हेल्थ टिप्स तेज़ दिमाग और शार्प मेमोरी के लिये ❤️‍🔥

🧘‍♀️👉एग्जाम करीब आते ही दिमाग में बस पढ़ना और पढ़ना ही याद आता है। न दिन देखते हैं और न रात किताबों की दुनिया में खोए रहने का मन करता है। जो समझ में आया तो ठीक वरन्‌ उसे रट लिया। दिक्कत यह है कि तैयारी में महिनों लगाने के बाद भी कई बार नतीजा सिफर ही निकलता है। यानी एग्जाम हॉल में हाथ में पेपर आते ही दिमाग की बत्ती गुल हो जाती है। तैयारियों के दौरान जो कुछ भी पढ़ा उसकी बस धुंधली सी यादें ही दिमाग में घूमने लगती हैं बाकी बस काले अंधेरे में कहीं खो जाता है।

🧘‍♀️👉ऐसा किसी एक के साथ नहीं बल्कि ज्यादातर युवाओं के साथ होता है। इससे बचने के लिए ज्यादा विद्यार्थी बाजार में आ रही मेमोरी इंप्रूव की दवाइयां या बुद्धिवर्धक पेय का इस्तेमाल करते हैं। उनके मुताबिक इससे उनकी मेमोरी इंप्रूव होती है लेकिन जानकार मानते हैं कि मेमोरी को इंप्रूव करने के बजाए उसे स्ट्रांग बनाएं ताकि लंबे समय तक आप उसे अपने दिमाग में रख सकते हैं।

🧘‍♀️👉ज्यादा देर रहेगा याद
मनोवैज्ञानिक के मुताबिक मेमोरी इंप्रूव करना और स्ट्रांग करना दो अलग- अलग बातें हैं। दवाएं खाकर कम समय में ज्यादा से ज्यादा याद करना संभव नहीं है लेकिन भरपूर पोषण और टेंशन फ्री रहकर दिमाग में स्टोर करने की क्षमता को विकसित किया जा सकता है। मेमोरी को इंप्रूव नहीं स्ट्रांग बनाने की जरूरत है। एक वक्त में कई तरह की बातें दिमाग में घूमने से हम भटकने लगते हैं और पिछला सबकुछ भूल जाते हैं। इससे बचने के लिए एक समय में एक ही काम करें। दस काम लेने से आपके सभी काम प्रभावित होंगे।

🧘‍♀️👉योग बढ़ाता है ऑक्सीजन लेवल
योग और प्राणायाम की मदद से दिमाग की स्मरण शक्ति को ब़ढ़ाया जा सकता है। इसमें कुछ क्रियाएं हैं, जिनकी मदद से दिमाग में ऑक्सीजन के स्तर को बढ़ाया जा सकता है। योग टीचर विकास पाठक बताते हैं कि मेमोरी को स्ट्रांग किया जा सकता है।

🧘‍♀️👉स्टूडेंट्स की यही समस्या होती है कि वो याद तो कर लेता है लेकिन दिमाग में स्टोर नहीं कर पाता। तनाव और ऑक्सीजन लेवल की कमी के कारण याद किया हुआ रीकॉल नहीं हो पाता। इस समस्या के लिए योग का सहारा लें। योग ऑक्सीजन लेवल को बढाता है।

🧘‍♀️👉लंबी सांसें लीजिये !
एग्जाम देने के पूर्व लंबी-लंबी सांसें छोड़ें और लें। यह प्रकिया 20 से 30 मिनट बाद दोहराएं। इससे दिमाग में ऑक्सीजन का स्तर बना रहेगा और दिमाग के फंक्शन को तनाव से मुक्त रखा जा सकता है। अक्सर यह प्रक्रिया किसी भी तनाव से भरे कार्य को करने से पहले की जाती है।

🧘‍♀️👉इनका करें उपयोग
1- ॐ का उच्चारण करें !
मुंह खोलकर लंबी सांस भरे और फिर ॐ का उच्चारण भी ऑक्सीजन पाने का बेहतरीन तरीका है।

2- भ्रामरी प्राणायाम भी है बेहतर !
भ्रामरी प्राणायाम से ऐसे हार्मोंस निकलते हैं जो दिमाग को रिलेक्स करते हैं। इसके साथ ही भ्रामरी प्राणायाम दिमाग में जूझने की क्षमता को ब़ढ़ाता है।

3- एक ही काम पर लगाएं मन !
एक वक्त पर एक ही काम करें। एक साथ कई काम करने से हमारा दिमाग स्थिर होने की बजाए तनाव से ग्रस्त हो जाता है। इस स्थिति से बचने की पूरी कोशिश करें।
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🫢 सुबह में तेलयुक्त भोजन लेने से करें परहेज़ 🫢

🫢काम का अत्याधिक दबाव झेलने वाले लोग आमतौर पर समय बचाने के फेर में नाश्ता छोड़ते हैं या फास्टफूड खाते हैं, लेकिन यह आदत सेहत के लिए ठीक नहीं है।

🫢 एक आहारविज्ञ के अनुसार, दिन की शुरुआत के लिए तेलयुक्त या तला-भूना खाना ठीक नहीं है।

 🫢गाजियाबाद स्थित कोलंबिया एशिया अस्पताल की आहारविज्ञ अंबिका शर्मा ने उन भोज्य पदार्थो की एक सूची साझा की है, जिनसे परहेज करना चाहिए।

🫢तेल या घी में डूबे परांठे बिल्कुल न खाएं। अगर आपको उन्हें खाने की इच्छा हो, तो उन पर अतिरिक्त घी और तेल लगाने से बचें। उन्हें दही के साथ खाएं।

🫢छात्रावास में रहने वालों के लिए आलू-पूड़ी एक आम नाश्ता है। यह स्वास्थ्यकर विकल्प नहीं है। 

🫢अगर कोई विकल्प नहीं हो तो पूड़ी एक टीशू या कागज पर रखें, कागज उसका अतिरिक्त तेल सोख लेगा। जंक फूड जैसे चिप्स, तले हुए फास्ट फूड और शीतल पेयपदार्थ या मीठा जैसे टॉफी के सेवन से बचें।
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खाली सीपी

खाली सीपी अगर यहाँ बैठो तुम खाली सीपी बनकर जो आने दे अंदर आती साँस को ताकि वो सृजन की प्राणदायी महक से पखार दे तुम्हारे अंतस को और निकाल दे ...